Monday, September 12, 2016

हथियारों के दलाल थे राजीव: विकिलीक्स

विकिलीक्स ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बारे में सनसनीखेज खुलासा किया है. विकिलीक्स ने आरोप लगाया है कि इंडियन एयरलाइन्स में काम करते हुए राजीव गांधीस्वीडन की एक कंपनी के लिए एजेंट का काम करते थे.

एक अंग्रेजी अखबार 'द हिंदू' में छपी इस खबर के अनुसार वो स्वीडन की साब स्कानिया कंपनी के साथ जुड़े हुए थे. ये कंपनी भारत को लड़ाकू विमान बेचना चाहती थी. हालांकि ये सौदा नहीं हो सका था. उस रेस में ब्रिटिश कंपनी जुगआर ने बाजी मार ली थी.

इस खुलासे से बाद बीजेपी ने गांधी परिवार से जवाब मांगा है. बीजेपी का कहना है कि इस पूरे मामले में सरकार और गांधी परिवार को सामने आकर सफाई देनी चाहिए.

गौरतलब है कि कुछ समय पूर्व कुथ लिंडस्ट्रोम ने वेबसाइट 'द हूट' को दिए साक्षात्कार में भी दावा किया था कि बोफोर्स तोप सौदे में पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत राजीव गांधी के खिलाफ रिश्वत लेने के साक्ष्य नहीं हैं. लेकिन इटली के व्यापारी ओत्तावियो क्वात्रोक्की के खिलाफ पर्याप्त सबूत होने के बावजूद उन्हें देश से सुरक्षित बाहर जाने दिया गया.

स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स पर भारतीय सेना को तोप सप्लाई करने का सौदा हथियाने के लिये 80 लाख डालर की दलाली चुकाने का आरोप है.

विकिलीक्स ने पूर्व रक्षामंत्री और समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस पर भी बड़ा खुलासा किया है. विकिलीक्स को मिले अमेरिकी केबल्स के मुताबिक- खुद को अमेरिकी विरोधी साबित करने वाले जार्ज फर्नांडिस ने आपात काल के दौरान अमेरिकी खुफिया एजेसी सीआईए से मदद मांगी थी.

विकिलीक्स का खुलासा है कि सीआईए से पैसे लेने पर भी समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस को एतराज नहीं था. खुलासा है कि इंदिरा गांधी के आपात काल से लड़ने के लिए जॉर्ज फर्नांडिस ने फ्रांसीसी सरकार से भी मदद मांगी.

गौरतलब है कि 1974 में रेलवे की हड़ताल को सफल बनाने में उस समय ऑल इंडिया रेलवेमैन फेडरेशन के अध्यक्ष जॉर्ज फर्नाडिंस का अहम योगदान था. इस हड़ताल से देश एक तरह से ठहर गया था और इसके कुछ समय बाद ही इंदिरा गांधी ने आपात काल की घोषणा की थी.

कांग्रेस ने किया खुलासे का खंडन
विकिलीक्स द्वारा देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को लेकर किए गए खुलासे को कांग्रेस पार्टी ने खारिज कर दिया है. कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कहा है कि विकिलीक्स के आरोपों में कोई दम नहीं है |

Sunday, September 11, 2016

मुलायम सिंह यादव ने शनिवार को कहा कि भाजपा ने अयोध्या में विवादित ढांचा गिरवा दिया था। उसके बाद मुसलमानों ने सपा की सरकार बनवायी


'मुसलमान हमारे खिलाफ नहीं'
सपा प्रमुख ने ‘मुलायम संदेश यात्रा’ की शुरुआत के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि भाजपा ने मस्जिद गिरवा दी थी। इसके बाद मुसलमानों ने हमारी सरकार बनवायी। मुसलमान हमारे खिलाफ नहीं है। अयोध्या में हमने किसी को मरवाया नहीं, फिर भी मुकदमा लिखा दिया गया।


'अब हर थाने में मुसलमान सिपाही'
उन्होंने कहा कि महिलाओं और मुसलमानों को पार्टी से ज्यादा जोड़ना है। मुसलमान हमारे खिलाफ नहीं है। दूसरी पार्टी के मुस्लिम नेता भी खिलाफ नहीं बोलते। मुसलमान सबसे ज्यादा पिछड़े हैं। हमने भर्तियां की। अब हर थाने में मुसलमान सिपाही हैं। उन्होंने कहा कि मुस्लिम पिछड़ा हुआ है। हमारी सरकार ने उसे आगे बढ़ाने का काम किया। हमारे नौजवान एक बार फिर सरकार बनवाएंगे।

'किसी नौजवान का हाथ खाली नहीं रहेगा'

लखनऊ के चिकन के कपड़ों का उल्लेख करते हुए मुलायम ने कहा कि विश्व में चिकन के कपड़े मशहूर हैं, जिन्हें लखनऊ के मुसलमान बनाते हैं। आज नौजवान संकल्प करके जाएगा कि फिर सपा की सरकार बनेगी। उन्होंने कहा कि अभी सभी नौजवानों को नौकरी नहीं मिली है, अबकी बार सरकार बनेगी तो कुछ न कुछ रोजगार देंगे। किसी नौजवान का हाथ नहीं खाली होगा।

'यूपी सरकार देश में सबसे अच्‍छी सरकार'
मुलायम ने कहा कि हमारे साथ लड़कियां कम हैं, क्योंकि आप लोग (सपा नेता एवं कार्यकर्ता) लड़कियों को बढ़ावा नहीं देते। इज्जत नहीं करते। सभा में 50 की जगह 500 लड़कियां होनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि मुलायम संदेश यात्रा निकलने के बाद अन्य दलों की सभी यात्राएं पीछे छूट जाएंगी। संसद में दिये गये भाषण का जिक्र करते हुए मुलायम बोले के सदन के अंदर किसी ने पूछा कि यूपी की सरकार कैसी चल रही है। हमने बताया कि यूपी की सरकार अच्छी चल रही है। मैं चुनौती देता हूं कि पूरे भारत में सबसे अच्छी सरकार यूपी की चल रही है।

'संदेश यात्रा निकलेगी तो विरोधी देखते रह जाएंगे'
सपा प्रमुख ने कहा कि पिछले चुनाव के घोषणा पत्र में जो वादे किये गए थे वो दो साल पहले ही पूरे हो गए। उसके बाद कई और काम किये जो घोषणापत्र में नहीं थे..संदेश यात्रा निकलेगी तो विरोधी देखते रह जाएंगे। उन्होंने कहा कि इस बार का चुनाव महत्वपूर्ण है। अन्य पार्टियां चुनाव प्रचार में लग गयी हैं लेकिन हमारी पार्टी थोडा पीछे रह गयी है लेकिन जब हमारे नौजवान निकलेंगे तो सभी पार्टियां पीछे रह जाएंगी।

Saturday, September 10, 2016

राजीव गांधी ट्रस्ट को जाकिर नाइक के NGO ने दिया था 50 लाख का दान, बवाल


इस्लामिक धर्मगुरु जाकिर नाइक के एनजीओ इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन (IRF) ने शुक्रवार को एक बड़ा खुलासा किया है। आईआरएफ के मुताबिक, उसने राजीव गांधी फाउंडेशन (RGF) को 50 लाख रुपए की डोनेशन दी थी। यह डोनेशन 2011 में दी गई थी।

आरजीएफ ने कहा- लौटा दिया पैसा

वहीं अपने बचाव में आरजीएफ का कहना है कि पैसा उन्हें नहीं बल्कि उनके साथी संगठन राजीव गांधी चैरीटेबल ट्रस्ट (RGCT) को दिया गया था। इसके साथ ही आरजीएफ ने यह भी कहा है कि वह पैसा कुछ महीने पहले ही लौटा भी दिया गया था।

आईआरएफ को नहीं मिले पैसे

वहीं आईआरएफ अपनी बात पर अब भी कायम है कि उसने पैसे आरजीएफ को ही दिए थे और वह किसी चैरेटेबल ट्रस्ट के लिए नहीं थे। आईआरएफ का यह भी कहना है कि उन्हें पैसे अबतक वापस भी नहीं मिले हैं।

2011 में दिए थे 50 लाख

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इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन के प्रवक्ता ने कहा, ‘हो सकता है कि वह पैसा वापस करने वाले हों लेकिन हमें अबतक पैसा मिला नहीं है।’ प्रवक्ता ने कहा, ‘हम लोगों ने राजीव गांधी फाउंडेशन को 2011 में 50 लाख रुपए दिए थे। हम लोग राजीव गांधी फाउंडेशन जैसे कई एनजीओ को पैसा देते हैं जो लड़कियों को पढ़ाने का काम करते हैं। ये पैसा मेडिकल, सर्जरी जैसी पढ़ाई करने वाली लड़कियों के लिए होता है।'

सोनिया गांधी ने बच्चों के साथ मिलकर बनाया था ट्रस्ट

बता दें कि राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट को सोनिया गांधी, उनके बच्चे राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा द्वारा बनाया गया था। वहीं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इस ट्रस्ट से जुड़े हैं. ये सभी लोग राजीव गांधी फाउंडेशन के ट्रस्टी भी हैं।

गृहमंत्रालय ने संस्था पर विदेश से पैसे लेने पर लगाया था प्रतिबंध

गौरतलब है कि गृहमंत्रालय ने जाकिर नाईक की संस्था पर विदेश से सीधे धन प्राप्त करने पर प्रतिबंध लगा दिया है और गृह मंत्रालय ने आरबीआई से संस्था को किसी तरह का धन जारी करने से पहले उससे अनुमति लेने को कहा है।

Wednesday, September 7, 2016

मदर टेरेसा का काला सच । उनकी सेवा का एक उद्देश्य हुआ करता था कि जिसकी सेवा का उद्देश्य था कि उसको ईसाई बनाया जाए।

उनका मानना था कि पीड़ा आपको जीसस के करीब लाती है जो मानवता के लिए सूली चढ़े थे. लेकिन जब वे खुद बीमार होती थीं तो इलाज करवाने देश-विदेश के महंगे अस्पतालों में चली जाती थीं

भारत में बीमारों, गरीबों और अनाथों की सेवा के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वालीं मदर टेरेसा का 1997 में निधन हुआ था. 2003 में पोप जॉन पॉल द्वितीय ने उन्हें धन्य घोषित किया था जो संत बनाए जाने की प्रक्रिया का पहला चरण है.
लेकिन इन्हीं मदर टेरेसा के जीवन की एक समानांतर कथा भी रही है. एक तरफ वे कइयों के लिए प्रेरणास्रोत रहीं तो दूसरी तरफ उनके काम और विचारों पर काफी विवाद भी रहा. कुछ समय पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत का उनके बारे में दिया गया बयान भी विवाद का विषय बन गया था. राजस्थान के भरतपुर में एक कार्यक्रम के दौरान भागवत का कहना था, ‘मदर टेरेसा की सेवा अच्छी रही होगी, पर इसमें एक उद्देश्य हुआ करता था कि जिसकी सेवा की जा रही है उसको ईसाई बनाया जाए.’ इसके बाद अलग-अलग हलकों से इस बयान की आलोचना हुई. जो कहा गया उसका लब्बोलुआब यह है कि मानवता के प्रति अपने काम के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाली मदर टेरेसा के बारे में भागवत ऐसा कैसे बोल सकते हैं?
उनकी बीमारी ठीक हो सकती थी. लेकिन वहां सबको इसी तरह से देखा जाता था कि ये सब कुछ दिनों के मेहमान हैं और इनकी बस सेवा की जाए

बहुत से लोग मानते हैं कि मदर टेरेसा उस सहज सामाजिक प्रक्रिया का हिस्सा हो गई हैं जिसके तहत असाधारण हस्तियों को मिथक में तब्दील करके उन्हें सवालों से परे कर दिया जाता है. वरना वक्त में पीछे लौटें तो हम पाते हैं कि करुणा की पर्याय कही जाने वाली यह शख्सियत भी कम कठोर आलोचनाओं का शिकार नहीं रही है.
काम को बढ़ाचढ़ाकर बताया गया
अरूप चटर्जी की चर्चित किताब मदर टेरेसा : द फाइनल वरडिक्ट मदर टेरेसा के काम पर कई सवाल उठाती है. पेशे से डॉक्टर और कुछ समय मदर टेरेसा की संस्था मिशनरीज ऑफ चैरिटी में काम कर चुके चटर्जी का दावा है कि मदर ने गरीबों के लिए किए गए अपने काम को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया. कोलकाता में ही पैदा हुए चटर्जी अब इंग्लैंड में रहते हैं. उनके मुताबिक मदर टेरेसा अक्सर कहती रहीं कि वे कलकत्ता की सड़कों और गलियों से बीमारों को उठाती थीं. लेकिन असल में उन्होंने या उनकी सहयोगी ननों ने कभी ऐसा नहीं किया. लोग जब उन्हें बताते थे कि फलां जगह कोई बीमार पड़ा है तो उनसे कहा जाता था कि 102 नंबर पर फोन कर लो.
चटर्जी के मुताबिक संस्था के पास कई एंबुलेंसें थीं लेकिन उनका मुख्य काम था ननों को प्रार्थना के लिए एक जगह से दूसरी जगह ले जाना. चटर्जी ने संस्था के इस दावे पर भी सवाल उठाया कि वह कोलकाता में रोज हजारों लोगों को खाना खिलाती है. चटर्जी की किताब के मुताबिक संस्था के दो या तीन किचन रोज ज्यादा से ज्यादा 300 लोगों को ही खाना देते हैं, वह भी सिर्फ मुख्य रूप से उन गरीब ईसाइयों को जिनके पास संगठन द्वारा जारी किया गया फूड कार्ड होता है.
जीवन से ज्यादा मृत्युदान के मिशन
अपने एक लेख में वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु नागर लिखते हैं, ‘यह कहना कि मदर टेरेसा सड़क पर पड़े, मौत से जूझ रहे सभी गरीबों की मसीहा थीं, गलत है. उन्होंने गरीबों-बीमारों के लिए 100 देशों में 517 चैरिटी मिशन जरूर स्थापित किए थे मगर ऐसे कई मिशनों का दौरा करने के बाद डॉक्टरों ने पाया कि ये दरअसल जीवनदान देने से ज्यादा मृत्युदान देने के मिशन हैं. इन मिशनों में से ज्यादातर में साफ-सफाई तक का ठीक इंतजाम नहीं था, वहां बीमार का जीना और स्वस्थ होना मुश्किल था, वहां अच्छी देख-रेख नहीं होती थी, भोजन तथा दर्द निवारक औषधियां तक वहां नहीं होती थीं.’
ब्रिटेन की प्रसिद्ध मेडिकल पत्रिका लैंसेट के सम्पादक डॉ रॉबिन फॉक्स ने भी 1991 में एक बार मदर के कोलकाता स्थित केंद्रों का दौरा किया था. फॉक्स ने पाया कि वहां साधारण दर्दनिवारक दवाइयां तक नहीं थीं. उनके मुताबिक इन केंद्रों में बहुत से मरीज ऐसे भी थे जिनकी बीमारी ठीक हो सकती थी. लेकिन वहां सबको इसी तरह से देखा जाता था कि ये सब कुछ दिनों के मेहमान हैं और इनकी बस सेवा की जाए. एकटीवी कार्यक्रम के दौरान अरूप चटर्जी का भी कहना था कि संस्था के केंद्रों में मरीजों की हालत बहुत खराब होती थी. वे रिश्तेदारों से नहीं मिल सकते थे, न ही कहीं घूम या टहल सकते थे. वे बस पटरों पर पड़े, पीड़ा सहते हुए अपनी मौत का इंतजार करते रहते थे.
चटर्जी ने इस पर भी सवाल उठाया कि मदर टेरेसा ऐसे लोगों से भी फंडिंग लेती थीं जिनकी आय के स्रोत संदिग्ध थे. इनमें भ्रष्ट तानाशाह और बेईमान कारोबारी भी शामिल थे

चटर्जी के मुताबिक मदर टेरेसा की संस्था मिशनरीज ऑफ चैरिटी के केंद्रों में गरीबों का जानबूझकर ठीक से इलाज नहीं किया जाता था. मदर टेरेसा पीड़ा को अच्छा मानती थीं. उनका मानना था कि पीड़ा आपको जीसस के करीब लाती है जो मानवता के लिए सूली चढ़े थे. लेकिन जब वे खुद बीमार होती थीं तो इलाज करवाने देश-विदेश के महंगे अस्पतालों में चली जाती थीं. अपनी किताब में चटर्जी ने यह तक कहा है कि मदर टेरेसा बीमार बच्चों की मदद करती थीं, लेकिन तभी जब उनके मां-बाप एक फॉर्म भरने के लिए तैयार हो जाते थे जिसमें लिखा होता था कि वे बच्चों से अपना दावा छोड़कर उन्हें मदर की संस्था को सौंपते हैं.
1994 में मदर टेरेसा पर बनी एक चर्चित डॉक्यूमेंटरी हैल्स एंजल में भी कुछ ऐसे ही आरोप लगाए गए. ब्रिटेन के चैनल फोर पर दिखाई गई इस फिल्म की स्क्रिप्ट क्रिस्टोफर हिचेंस द्वारा लिखी गई थी. 1995 में हिचेंस ने एक किताब भी लिखी. द मिशनरी पोजीशन : मदर टेरेसा इन थ्योरी एंड प्रैक्टिस नाम की इस किताब में हिचेंस का कहना था कि मीडिया ने मदर टेरेसा का मिथक गढ़ दिया है जबकि सच्चाई इसके उलट है. लेख का सार यह था कि गरीबों की मदद करने से ज्यादा दिलचस्पी मदर टेरेसा की इसमें थी कि उनकी पीड़ा का इस्तेमाल करके रोमन कैथलिक चर्च के कट्टरपंथी सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार किया जाए.
परोपकार के लिए भ्रष्टाचार का पैसा और वह भी पूरा खर्च नहीं
चटर्जी की किताब में यह भी कहा गया है कि मदर टेरेसा को गरीबों की मदद करने के लिए अकूत पैसा मिला लेकिन, उसका एक बड़ा हिस्सा उन्होंने खर्च ही नहीं किया. चटर्जी ने इस पर भी सवाल उठाया कि मदर टेरेसा ऐसे लोगों से भी फंडिंग लेती थीं जिनकी आय के स्रोत संदिग्ध थे. इनमें भ्रष्ट तानाशाह और बेईमान कारोबारी भी शामिल थे. जैसे उन्होंने चार्ल्स कीटिंग से भी पैसा लिया जिन्होंने अमेरिका में अपने घोटाले से खूब कुख्याति पाई थी.
लेख का सार यह था कि गरीबों की मदद करने से ज्यादा दिलचस्पी मदर टेरेसा की इसमें थी कि उनकी पीड़ा का इस्तेमाल करके रोमन कैथलिक चर्च के कट्टरपंथी सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार किया जाए

पीड़ा से प्यार, ईसाइयत का प्रसार
चटर्जी के मुताबिक मदर टेरेसा की संस्था मिशनरीज ऑफ चैरिटी के केंद्रों में गरीबों का जानबूझकर ठीक से इलाज नहीं किया जाता था. मदर टेरेसा पीड़ा को अच्छा मानती थीं. उनका मानना था कि पीड़ा आपको जीसस के करीब लाती है जो मानवता के लिए सूली चढ़े थे. लेकिन जब वे खुद बीमार होती थीं तो इलाज करवाने देश-विदेश के महंगे अस्पतालों में चली जाती थीं. अपनी किताब में चटर्जी ने यह तक कहा है कि मदर टेरेसा बीमार बच्चों की मदद करती थीं, लेकिन तभी जब उनके मां-बाप एक फॉर्म भरने के लिए तैयार हो जाते थे जिसमें लिखा होता था कि वे बच्चों से अपना दावा छोड़कर उन्हें मदर की संस्था को सौंपते हैं.
1994 में मदर टेरेसा पर बनी एक चर्चित डॉक्यूमेंटरीहैल्स एंजल में भी कुछ ऐसे ही आरोप लगाए गए. ब्रिटेन के चैनल फोर पर दिखाई गई इस फिल्म की स्क्रिप्ट क्रिस्टोफर हिचेंस द्वारा लिखी गई थी. 1995 में हिचेंस ने एक किताब भी लिखी. द मिशनरी पोजीशन : मदर टेरेसा इन थ्योरी एंड प्रैक्टिस नाम की इस किताब में हिचेंस का कहना था कि मीडिया ने मदर टेरेसा का मिथक गढ़ दिया है जबकि सच्चाई इसके उलट है. लेख का सार यह था कि गरीबों की मदद करने से ज्यादा दिलचस्पी मदर टेरेसा की इसमें थी कि उनकी पीड़ा का इस्तेमाल करके रोमन कैथलिक चर्च के कट्टरपंथी सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार किया जाए.
चर्चित नारीवादी और पत्रकार जर्मेन ग्रीअर ने भी कुछ ऐसी बातें कहीं थीं. ग्रीअर ने मदर टेरेसा को एक धार्मिक साम्राज्यवादी कहा था जिसने सेवा को मजबूर गरीबों में ईसाई धर्म फैलाने का जरिया बनाया

इस किताब की खूब तारीफें हुईं तो आलोचनाएं भी. एक पाठक ने कहा कि अगर कहीं नर्क है तो हिचेंस अपनी इसी किताब के लिए उसमें जाएंगे. 80 के दशक में ब्रिटेन के चर्चित अखबार ब्रिटेन में छपे एक लेख में चर्चित नारीवादी और पत्रकार जर्मेन ग्रीअर ने भी कुछ ऐसी बातें कहीं थीं. ग्रीअर ने मदर टेरेसा को एक धार्मिक साम्राज्यवादी कहा था जिसने सेवा को मजबूर गरीबों में ईसाई धर्म फैलाने का जरिया बनाया.
आपातकाल की तारीफ, गर्भपात की आलोचना
इससे पहले 1975 में भी मदर टेरेसा का एक बयान विवादों में रहा था. इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल पर उनका कहना था कि इससे लोग खुश हैं क्योंकि नौकरियां बढ़ी हैं और हड़तालें कम हुई हैं. गर्भनिरोधक उपायों और गर्भपात पर भी मदर टेरेसा के रुख ने आलोचनाएं बटोरीं. उनका मानना था कि संयम गर्भनिरोधक उपाय अपनाने से बेहतर है और गर्भपात तो सबसे बड़ी बुराई है जो हत्या के बराबर है. परिवार नियोजन और नारीवाद के पैरोकारों ने इस पर उनकी खूब आलोचना की थी.
आखिरी सांसें गिन रहे लोगों को बपतिस्मा
आखिर सांसें गिन रहे लोगों को बपतिस्मा देने के लिए भी मदर टेरेसा की खासी आलोचना हुई. बपतिस्मा यानी पवित्र जल छिड़ककर ईसाई धर्म में दीक्षा देने का कर्मकांड. आरोप लगे कि न तो उनका संगठन लोगों को यह बताता है कि इसका मतलब क्या है और न ही वह इसका ख्याल करता है कि उस व्यक्ति की धार्मिक आस्था क्या है. इस बारे में 1992 में अमेरिका के कैलीफोर्निया में एक भाषण के दौरान मदर टेरेसा का कहना था, ‘हम उस आदमी से पूछते हैं, क्या तुम वह आशीर्वाद चाहते हो जिससे तुम्हारे पाप क्षमा हो जाएं औऱ तुम्हें भगवान मिल जाए? किसी ने कभी मना नहीं किया.’
दिवंगत होने के बाद भी विवाद जारी रहे
मदर टेरेसा के 1997 में दिवंगत होने के बाद भी उन पर विवाद होते रहे. जिस कथित ‘चमत्कार’ के कारण 2003 में वेटिकन ने उन्हें धन्य घोषित किया उसे तर्कवादियों ने सिरे से ख़ारिज कर दिया था. कहा गया था कि पेट के ट्यूमर से जूझ रही पश्चिम बंगाल की एक महिला मोनिका बेसरा ने एक दिन अपने लॉकेट में मदर टेरेसा की तस्वीर देखी और उनका ट्यूमर पूरी तरह से ठीक हो गया. लेकिन कई रिपोर्टों के मुताबिक जिन डॉक्टरों ने मोनिका बेसरा नाम की इस महिला का इलाज किया उनका कहना है कि मदर टेरेसा की मृत्यु के कई साल बाद भी मोनिका दर्द सहती रही. हालांकि वेटिकन के धर्मगुरूओं ने इस कथित चमत्कार को मान्यता दे दी थी.
कई लोग हैं जो मानते हैं कि मदर टेरेसा को संत बनाने के पीछे वेटिकन की मजबूरी भी है. चर्चों में लोगों का आना लगातार कम हो रहा है और ईसाई धर्म और इसके केंद्र वेटिकन में लोगों का विश्वास लौटाने के लिए ऐसा कदम उठाना जरूरी था

Tuesday, September 6, 2016

कांग्रेस ने घोटाले के आरोप में भी घोटाला कर दिया!

कांग्रेस ने घोटाले के आरोप में भी घोटाला कर दिया!

कांग्रेस ने अपने दौर में किए 45 हजार करोड़ रुपये के कथित टेलीकॉम घोटाले का आरोप भी नरेंद्र मोदी सरकार पर मढ़ दिया है। बीती शाम पार्टी ने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर ऐलान किया कि वो मोदी सरकार के बहुत बड़े घोटाले का पर्दाफाश करने जा रहे हैं। मीडिया ने भी इस ‘पर्दाफाश’ को सच मानकर चलाना भी शुरू कर दिया। लेकिन कुछ मिनट के अंदर ही यह जानकारी सामने आई कि जिस घोटाले का जिक्र कांग्रेस के नेता कर रहे थे वो दरअसल 2006 से 2009 के बीच हुआ था और उस दौरान कांग्रेस की सरकार थी। ये मामला फिलहाल संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) के तहत है और बहुत जल्द इस मामले में कांग्रेस के कई नेता नप सकते हैं।

अपने ही फैलाए जाल में फंसी कांग्रेस!

दरअसल सीएजी के ऑडिट में पाया गया था कि 6 बड़ी टेलीकॉम कंपनियों ने 2006 से 2009 के बीच अपनी आमदनी कम दिखाई। इसकी वजह से उन पर टैक्स कम लगा। यह रकम 45 हजार करोड़ के करीब बैठने का अनुमान है। यह मामला पहले से ही मीडिया में आ चुका है और इसकी जांच पब्लिक एकाउंट्स कमेटी कर रही है। रिपोर्ट आने के बाद मोबाइल कंपनियों से इस रकम की ब्याज समेत वसूली की जाएगी। इसके अलावा कंपनियों को मोटा जुर्माना भी देना पड़ सकता है। इस मामले में उस वक्त की सरकार के कुछ मंत्रियों की भूमिका भी सवालों के दायरे में है।
पिछले महीने आई है सीएजी की पूरी रिपोर्ट

इस बारे में कैग की विस्तृत रिपोर्ट पिछले महीने ही आई है। जाहिर है इसमें बताए गए तथ्यों और उसके आधार पर कानूनी केस बनाने में कुछ वक्त तो लगेगा ही। टेलीकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने भी कहा कि लगता है कि कांग्रेस के नेताओं को सीएजी की रिपोर्ट पढ़ने के बाद यह समझ में नहीं आया कि इसमें जिस धांधली का जिक्र किया गया है वो उन्हीं के कार्यकाल में हुआ था।

घोटाले के आरोप पर मीडिया ने छिपाए तथ्य

गुरुवार शाम जब कांग्रेस दफ्तर में पार्टी प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला तथाकथित पर्दाफाश कर रहे थे, तब कई न्यूज चैनलों ने उसे लाइव दिखाया। देर रात तक खबर चलती रही कि कांग्रेस ने मोदी सरकार में 45 हजार करोड़ के टेलीकॉम घोटाले का आरोप लगाया है। आम तौर पर ऐसे मामलों में सरकार का पक्ष जरूर चलाया जाता है, लेकिन किसी चैनल, अखबार या वेबसाइट ने देर रात तक सरकार का पक्ष भी बताने की जरूरत नहीं समझी और इस झूठी खबर को फैलाने में कांग्रेस की भरपूर मदद की। सवाल यह है कि मुख्यधारा मीडिया इतने बड़े आर्थिक भ्रष्टाचार की खबर पर इतनी गैर-जिम्मेदार रिपोर्टिंग कैसे कर सकता है?

फिलहाल इस फर्जी पर्दाफाश के लिए सोशल मीडिया पर कांग्रेस पार्टी की जमकर चुटकी ली जा रही है।

हिन्दू विरोधी मोहनदास करमचंद गाँधी के काले कारनामे

मोहनदास करमचंद गाँधी के काले कारनामे !!

1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (1919) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के खलनायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाए। गान्धी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से मना कर दिया।

2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गान्धी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएं, किन्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों को आतंकवादी कहा जाता है।

3. 6 मई 1946 को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गान्धी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।

4.मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए 1921 में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला में मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग 1500 हिन्दु मारे गए व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।

5.1926 में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या अब्दुल रशीद नामक एक मुस्लिम युवक ने कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।

6.गान्धी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।

7.गान्धी ने जहाँ एक ओर काश्मीर के हिन्दु राजा हरि सिंह को काश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।

8. यह गान्धी ही था जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।

9. कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (1931) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।

10. कॉंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहा था, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया।

11. लाहोर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।

12. 14-15 जून, 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।

13. मोहम्मद अली जिन्ना ने गान्धी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गान्धी ने अस्वीकार कर दिया।

14. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।

15. पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।

16. 22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपए की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी।

17.गाँधी ने गौ हत्या पर पर्तिबंध लगाने का विरोध किया

18. द्वितीया विश्वा युध मे गाँधी ने भारतीय सैनिको को ब्रिटेन का लिए हथियार उठा कर लड़ने के लिए प्रेरित किया , जबकि वो हमेशा अहिंसा की पीपनी बजाते है

19. क्या 50000 हिंदू की जान से बढ़ कर थी मुसलमान की 5 टाइम की नमाज़ ????? विभाजन के बाद दिल्ली की जमा मस्जिद मे पानी और ठंड से बचने के लिए 5,000 हिंदू ने जामा मस्जिद मे पनाह ले रखी थी...मुसलमानो ने इसका विरोध किया पर हिंदू को 5 टाइम नमाज़ से ज़यादा कीमती अपनी जान लगी.. इसलिए उस ने माना कर दिया. .. उस समय गाँधी नाम का वो शैतान बरसते पानी मे बैठ गया धरने पर की जब तक हिंदू को मस्जिद से भगाया नही जाता तब तक गाँधी यहा से नही जाएगा....फिर पुलिस ने मजबूर हो कर उन हिंदू को मार मार कर बरसते पानी मे भगाया.... और वो हिंदू--- गाँधी मरता है तो मरने दो ---- के नारे लगा कर वाहा से भीगते हुए गये थे...,,, रिपोर्ट --- जस्टिस कपूर.. सुप्रीम कोर्ट..... फॉर गाँधी वध क्यो ?

20. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी लगाई जानी थी, सुबह करीब 8 बजे। लेकिन 23 मार्च 1931 को ही इन तीनों को देर शाम करीब सात बजे फांसी लगा दी गई और शव रिश्तेदारों को न देकर रातोंरात ले जाकर ब्यास नदी के किनारे जला दिए गए। असल में मुकदमे की पूरी कार्यवाही के दौरान भगत सिंह ने जिस तरह अपने विचार सबके सामने रखे थे और अखबारों ने जिस तरह इन विचारों को तवज्जो दी थी, उससे ये तीनों, खासकर भगत सिंह हिंदुस्तानी अवाम के नायक बन गए थे। उनकी लोकप्रियता से राजनीतिक लोभियों को समस्या होने लगी थी।

उनकी लोकप्रियता महात्मा गांधी को मात देनी लगी थी। कांग्रेस तक में अंदरूनी दबाव था कि इनकी फांसी की सज़ा कम से कम कुछ दिन बाद होने वाले पार्टी के सम्मेलन तक टलवा दी जाए। लेकिन अड़ियल महात्मा ने ऐसा नहीं होने दिया। चंद दिनों के भीतर ही ऐतिहासिक गांधी-इरविन समझौता हुआ जिसमें ब्रिटिश सरकार सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राज़ी हो गई। सोचिए, अगर गांधी ने दबाव बनाया होता तो भगत सिंह भी रिहा हो सकते थे क्योंकि हिंदुस्तानी जनता सड़कों पर उतरकर उन्हें ज़रूर राजनीतिक कैदी मनवाने में कामयाब रहती। लेकिन गांधी दिल से ऐसा नहीं चाहते थे क्योंकि तब भगत सिंह के आगे इन्हें किनारे होना पड़ता ।

हिन्दू विरोधी कांग्रेस के काले कारनामे

कांग्रेस और विशेषकर नेहरू के काले कारनामे का इतिहास इतना बड़ा है
की लोग लिखते लिखते थक जायेंगे
चन्द्र शेखर आजाद की मुखबिरी करने वाले जवाहरलाल नेहरू थे
सो देश का वह महान व्यक्ति असमय अंग्रेज की गोली का शिकार हो गया।
नेहरू उस हर व्यक्ति से खफा रहते थे जिसकी प्रसिद्धि होती थी
जनता जिसको पसंद करती थी और जो नेहरू अनुसरण कर नेहरू गुणगान नहीं करता था।
सुभाष चन्द्र बोस को भारत निष्कासन हो जाये
सो नेहरू और उनके मोह में ग्रस्त गांधी ने इस महान देशभक्त का भरपूर विरोध किया
नेहरू की सुभाष विरोधी मानसिकता इस बात से अब जग जाहिर हो गयी की
वे आजाद भारत में भी उनकी जासूसी करवाते थे
क्यों
कोई इस प्रश्न का उत्तर देगा ?
वे सुभाष बाबू से ईर्ष्या करते थे
जैसे महिलाये कई बार करती है (माताये क्षमा करे )
पाकिस्तान का निर्माण
नेहरू की सत्ता भूख और गांधी के द्वारा उसका अँधा समर्थन
उस पाप का फल है
वरना आरएसएस को जब देश विभाजन की जब अंग्रेज योजना की जानकारी मिली थी
तब पंजाब सिंध कश्मीर जम्मू बंगाल में काम का भीषण विस्तार किया था
बंगाल में अपेक्षित विस्तार नहीं हुआ था
परन्तु पश्चिमी भाग में जबरदस्त विस्तार हो गया था
गांव गांव शाखा फेल गयी थी
उसी शक्ति के बल पर इस क्षेत्र का हिन्दू बचाया का सका था
संघ से स्वयंसेवक का बड़ा बलिदान हुआ था
राजस्थान के प्रान्त प्रचारक रहे और बाद में उत्तर पूर्व क्षेत्र के क्षेत्रीय प्रचारक बने माननीय देव जी मतलब ब्रम्हदेव जी कहते थे
की विभाजन के बाद पंजाब में शाखाओ में संख्या एकदम घट गयी थी
कारण कई सारे घरो से जवानो का बलिदान हो गया था
सो माताये अपने छोटे बच्चो को शाखा भेजने से परहेज करती थी
पंजाब का काम विभाजन से बहुत प्रभावित हुआ था
वरना पूज्य गुरूजी ने 1942 से पंजाब सिंध आदि क्षेत्र में इतना परिश्रम करके जो नौजवान टीम खड़ी करी थी
की यदि जैसी अंग्रेज योजना 1949 -1950 में विभाजन करने की थी
वही चली होती तो आरएसएस विभाजन नहीं होने देता
इतनी तैयारी चल रही थी
कोई उस तैयारी की कल्पना कर सकता है
कभी कोई बचा हुआ उस काल का सिंध पंजाब का कोई स्वयंसेवक मिल जाए और वह ठीक से बता दे तो बहुत जानकारी मिल जाएगी
जब यह सारी भनक माउंट बेटन को मिली
तो उसने एडविना का दांव खेलकर
नेहरू को उकसाया की य
दि आरएसएस सफल हो गया
तो तुम प्रधान मंत्री नहीं बनोगे
सरदार पटेल या राजेंद्र प्रसाद बन जायेगा
वस्तुत ईसाई मिशनरी वेटिकन हिन्दू समाज के ज्ञान विज्ञान से भयभीत था
उसे लगता था की कोई राष्ट्रीय मानसिकता का व्यक्ति प्रधान मंत्री बन गया तो भारत तीव्र गति से प्रगति करेगा
और विश्व का शिरोमणि बन जायेगा
उस समय उसे नेहरू सबसे योग्य ईसाई प्रचारक लगता था
सो नेहरू की जिद्द से देश विभाजन की तारीख बहुत जल्दी तय की गयी।
पाकिस्तान बनवाने में नेहरू की मुख्य भूमिका थी
बनने के बाद भी नेहरू को भय था
की सरदार पटेल आगे बढ़ जायेगा
नेहरू जिन्ना पर शेख अब्दुल्ला पर विश्वास करने को तैय्यार थे
परन्तु सरदार पटेल पर विश्वास नहीं करते थे
मोहनदास करमचंद गांधी महात्मा था
परन्तु अपनी आदतो से वृति से लाचार था
वह शुरू से कामुक वृति का व्यक्ति था
आप गांधी की लिखी जीवनी पढ़ेंगे तो आपको गांधी का कस्तूरबा के प्रति दैहिक व्यवहार ज्ञात हो जायेगा
यह बात गांधी के कई पत्रो में बाद में उनके महिला व्यवहार से भी साबित होती है
यह कामुकता गांधी के लिए आजीवन बोझ या दंड स्वरूप रही
नेहरु ने इसका भरपूर लाभ उठाया
वैसे गांधी भी प्रगतिशीलता की बीमारी से पीड़ित थे
इसी कारण वे मांसाहार कर चुके थे
शराब को भी पी चुके थे
परन्तु गांधी की माँ बहुत धर्म निष्ठ थी
इसी कारन सो गांधी भी सामान्य श्रद्धालु बने रहे।
सो माउंट बेटन की सलाह से नेहरू ने तत्काल विभाजन की बात करी
जिसमे वह सफल रहे कारण बेटन तो यही चाहता था
उसके बाद उसी ने बेटन को गवर्नर जनरल बनवाया था
जिस से वह अपनी मनमानी कर सके।
कुछ नेहरू का उसके भाग्य ने साथ दिया
वरना सरदार पटेल का जल्दी निधन नहीं होता
गोडसे गांधी को गोली नहीं मारता
और उस बहाने आरएसएस पर प्रतिबंध नहीं लगता
गांधी हत्यारी होने का असत्य आरोप लगाने का बदनाम करने का अवसर नेहरू को नहीं मिलता
सो यह नेहरू की देश द्रोहिता का परिणाम आज भी देश भुगत रहा है
यह इस देश का दुर्भाग्य रहा की मन तन आचरण व्यवहार से हिंदू नहीं
इस देश की सनातन परम्परा वेद दर्शन उपनिषद यहाँ तक रामचरितमानस का विरोधी
इस देश का 18 साल तक प्रधान मंत्री बना रहा।